छठ पूजा 2026 नहाय खाय और उषा अर्घ्य की विधि | Bhakti Vibha

छठ पूजा 2026: नहाय-खाय से उषा अर्घ्य तक — चार दिनों की पूरी विधि, नियम और कथा हिंदी में

नमस्ते दोस्तों! 🙏

मेरा नाम भानु प्रताप सिंह है, और आज बात करेंगे उस पर्व की जिसमें सूरज को सुबह भी प्रणाम किया जाता है और शाम को भी।

मेरे दोस्त अमित की माँ हर साल छठ का व्रत रखती हैं। एक बार मैं उनके घर नवंबर में गया था। आँगन में मिट्टी का चूल्हा बना था। हवा में गुड़ और घी की महक थी, और घर की औरतें धीमे सुर में गीत गा रही थीं। मैंने पूछा, "चाची, इतना कठिन व्रत कैसे निभा लेती हैं?"

उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "बेटा, यह व्रत हम नहीं रखते। यह हमसे रखवा लिया जाता है।"

उस दिन मुझे समझ आया कि छठ सिर्फ पूजा नहीं है। यह श्रद्धा, अनुशासन और परिवार का साझा उत्सव है। आज इस लेख में आपको छठ 2026 की तारीखें, चारों दिनों की विधि, नियम, कथा और कुछ ज़रूरी सावधानियाँ बताऊँगा।


छठ पूजा 2026 कब है? चारों दिनों की तारीखें

छठ का पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर मनाया जाता है। इस साल मुख्य दिन, यानी संध्या अर्घ्य, रविवार 15 नवंबर 2026 को है।

चार दिन का पूरा कार्यक्रम

दिनअनुष्ठानतारीख
पहला दिननहाय-खाय13 नवंबर 2026, शुक्रवार
दूसरा दिनखरना (लोहंडा)14 नवंबर 2026, शनिवार
तीसरा दिनसंध्या अर्घ्य15 नवंबर 2026, रविवार
चौथा दिनउषा अर्घ्य16 नवंबर 2026, सोमवार

सूर्योदय और सूर्यास्त का समय हर शहर में अलग होता है। इसलिए अर्घ्य का सही समय अपने शहर के हिसाब से देखें। तिथि की पुष्टि के लिए Drik Panchang की छठ पूजा तारीख और समय वाली पेज देख सकते हैं। चारों दिनों का कैलेंडर यहाँ मिल जाएगा।

छठ में अभी लगभग एक महीना बाकी है। Bhakti Vibha के Days Between Dates Calculator में आज की तारीख डालकर देख लें कि कितने दिन बचे हैं, ताकि तैयारी समय पर शुरू हो।


छठ पूजा क्या है और किसकी उपासना होती है?

छठ सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का पर्व है। छठी मैया को षष्ठी देवी भी कहा जाता है। परंपरा में उन्हें संतान की रक्षा और परिवार की सुख-शांति से जोड़ा जाता है।

"छठ" शब्द का अर्थ है छह, यानी षष्ठी तिथि। यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र में मनाया जाता है। अब दिल्ली, मुंबई और विदेशों में बसे परिवार भी इसे उतनी ही श्रद्धा से मनाते हैं।

यह पर्व बाकी त्योहारों से अलग क्यों है?

छठ की सबसे बड़ी खासियत इसकी सादगी और कठोर अनुशासन है। इसमें मंदिर या मूर्ति के बजाय सीधे उगते और डूबते सूरज को अर्घ्य दिया जाता है। आमतौर पर इसमें किसी पुरोहित की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। व्रती खुद जल में खड़े होकर पूजा करते हैं।

सबसे सुंदर बात यह है कि इसमें डूबते सूरज की भी पूजा होती है। जो विदा हो रहा है, उसे भी सम्मान दिया जाता है। मेरे नाना शिवप्रसाद जी कहा करते थे, "बेटा, जो डूबते को भी प्रणाम करना सीख ले, उसे जीवन में किसी का अपमान करना नहीं आता।"

सूर्य की इसी महिमा को समझने के लिए Vedic Heritage Portal पर वैदिक साहित्य में सूर्य उपासना के बारे में पढ़ सकते हैं।


छठ पूजा की पौराणिक कथाएं और मान्यताएं

छठ के पीछे कई कथाएं प्रचलित हैं। हर कथा इस पर्व का एक अलग पहलू दिखाती है।

राजा प्रियव्रत और षष्ठी देवी की कथा

पुराणों में एक कथा आती है। राजा प्रियव्रत की कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप ने उनसे पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। रानी मालिनी ने पुत्र को जन्म दिया, लेकिन वह जीवित नहीं था।

राजा बहुत दुखी हुए। तभी वहाँ षष्ठी देवी प्रकट हुईं और उन्होंने राजा को अपनी पूजा का मार्ग बताया। मान्यता है कि तभी से षष्ठी तिथि पर इस देवी की उपासना की परंपरा चली।

यह कथा बताती है कि छठ का संबंध संतान की सुरक्षा और परिवार की भलाई से जुड़ा है। ऐसी ही दृढ़ता की एक और कथा हमने ध्रुव की कथा में लिखी है, जहाँ पाँच साल के एक बालक ने अपने संकल्प से इतिहास रचा।

कर्ण और सूर्य उपासना

महाभारत के कर्ण को सूर्य पुत्र माना जाता है। मान्यता है कि वे रोज़ सुबह जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। कई लोग मानते हैं कि छठ की परंपरा का एक सिरा यहीं से जुड़ता है।

 द्रौपदी और पांडवों की मान्यता

एक और मान्यता के अनुसार वनवास के कठिन समय में द्रौपदी और पांडवों ने सूर्य की उपासना की थी, ताकि उन्हें अपना खोया हुआ राज्य वापस मिल सके।

सीता माता और राम की लोक मान्यता

लोक परंपरा में यह भी कहा जाता है कि रावण वध के बाद अयोध्या लौटकर राम और सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उपवास रखकर सूर्य की पूजा की थी।

इन कथाओं में बातें अलग-अलग हैं, लेकिन सबका सार एक है। सूर्य जीवन देने वाली शक्ति हैं, और उनके प्रति कृतज्ञता ही छठ का मूल है। छठ दीपावली के कुछ ही दिन बाद आता है। दीपावली की पूजा विधि हमारी इस पोस्ट में पढ़ें: दीपावली 2026 लक्ष्मी-गणेश पूजन विधि।


पहला दिन: नहाय-खाय (13 नवंबर)

छठ की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। नहाय का मतलब स्नान और खाय का मतलब भोजन।

इस दिन क्या होता है?

व्रती सुबह नदी, तालाब या घर पर स्नान करते हैं। यदि गंगा जल उपलब्ध हो तो उसे स्नान के जल में मिलाया जाता है। फिर पूरे घर की अच्छी तरह सफाई होती है। छठ में स्वच्छता सबसे ज़रूरी मानी जाती है।

इसके बाद व्रती एक समय सात्विक भोजन करते हैं। आमतौर पर इसमें लौकी (कद्दू) की सब्ज़ी, चने की दाल और चावल बनता है। परंपरा में यह भोजन मिट्टी या पीतल के बर्तन में और अक्सर आम की लकड़ी की आँच पर पकाया जाता है। नमक सेंधा ही इस्तेमाल करते हैं।

एक छोटा सा उदाहरण

अमित की माँ बताती हैं कि इस दिन घर में प्याज-लहसुन का नाम भी नहीं लिया जाता। रसोई को पहले धोया जाता है। फिर जो भोजन बनता है, पहले व्रती खाती हैं और उसके बाद परिवार के बाकी लोग। यही नियम है।

यहीं से घर का माहौल बदलने लगता है। बच्चे भी समझ जाते हैं कि अब कुछ खास होने वाला है।


दूसरा दिन: खरना (14 नवंबर)

दूसरा दिन खरना का होता है। कई जगह इसे लोहंडा भी कहते हैं।

दिनभर का उपवास

इस दिन व्रती पूरे दिन उपवास रखती हैं। अधिकतर परिवारों में दिन में पानी भी नहीं पिया जाता। शाम को सूर्यास्त के बाद पूजा होती है।

खरना का प्रसाद

पूजा में गुड़ की खीर (रसियाव) और रोटी बनती है, साथ में केला रखा जाता है। पहले यह प्रसाद छठी मैया को अर्पित किया जाता है। फिर व्रती उसे ग्रहण करती हैं। इसके बाद परिवार और आस-पड़ोस के लोगों में प्रसाद बाँटा जाता है।

खरना के प्रसाद की एक खास परंपरा है। जब व्रती भोजन करती हैं, तब घर में पूर्ण शांति रखी जाती है। कोई शोर नहीं करता।

यहीं से शुरू होता है असली तप

खरना का प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रती का अगला उपवास शुरू हो जाता है। यह लगभग 36 घंटे का निर्जला व्रत होता है, जो चौथे दिन सुबह उषा अर्घ्य के बाद पूरा होता है।

यह व्रत शारीरिक रूप से कठिन है। इसलिए इस पर सावधानी वाला हिस्सा मैं आगे अलग से लिख रहा हूँ। उसे ज़रूर पढ़ें।


तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य (15 नवंबर)

तीसरा दिन छठ का मुख्य दिन होता है। सुबह से ही घर में तैयारियाँ तेज़ हो जाती हैं।

ठेकुआ और प्रसाद की तैयारी

इस दिन ठेकुआ बनता है। ठेकुआ छठ का सबसे प्रसिद्ध प्रसाद है, जो सिर्फ इसी पर्व पर खास तौर से बनता है। इसे गेहूँ के आटे, गुड़ और घी से बनाया जाता है।

संक्षेप में विधि यह है:

  • आटे में घी का मोयन मिलाया जाता है।
  • गुड़ को पानी में घोलकर उससे आटा गूँधा जाता है।
  • सूखा नारियल और इलायची या सौंफ मिलाई जाती है।
  • साँचे या हाथ से आकार देकर घी में धीमी आँच पर तला जाता है।

प्रसाद की पूरी सामग्री बाँस के सूप और दउरा (टोकरी) में सजाई जाती है। इसमें ये चीज़ें रखी जाती हैं:

  • ठेकुआ
  • केला
  • नारियल
  • गन्ना
  • मौसमी फल
  • नींबू और सुथनी जैसी परंपरागत चीज़ें

मेरे दोस्त राजू की दादी कहती हैं कि ठेकुआ बनाते समय कोई उसे चखता नहीं, क्योंकि वह पहले छठी मैया और सूर्य देव का होता है। यह परंपरा मन में एक अलग ही श्रद्धा जगाती है।

घाट की ओर यात्रा

शाम को पूरा परिवार सूप-दउरा सिर पर उठाकर घाट की ओर निकलता है। रास्ते में महिलाएँ और पुरुष छठ के गीत गाते चलते हैं। इन गीतों की मिठास और अपनापन अलग ही होता है। शारदा सिन्हा जी की आवाज़ में गाए छठ गीत तो इस पर्व की पहचान बन चुके हैं।

घाट पर व्रती कमर तक जल में खड़ी होती हैं। सूर्यास्त के समय जल या दूध से अर्घ्य दिया जाता है। हर बार अर्घ्य देते समय सूप को हाथों में लेकर सूर्य की ओर किया जाता है। उस पल लगता है कि पूरा घाट एक साथ प्रार्थना कर रहा है।

कोसी भरने की परंपरा

कुछ परिवारों में मन्नत पूरी होने पर इसी शाम कोसी भरी जाती है। इसमें गन्ने के घेरे के बीच मिट्टी के दीयों से सजी कोसी रखकर पूजा की जाती है। यह परंपरा हर परिवार में नहीं होती, इसलिए अपने परिवार की रीति के अनुसार ही करें।

यह पूरा दृश्य बहुत भावुक करने वाला होता है। जल में दीये तैरते हैं और सूरज धीरे-धीरे डूबता है। ऐसी ही आस्था का दृश्य सागर किनारे बसे पवित्र धाम में भी दिखता है, जिसके बारे में हमने सोमनाथ मंदिर की यात्रा गाइड में लिखा है।


चौथा दिन: उषा अर्घ्य और पारण (16 नवंबर)

चौथे दिन भोर से पहले, अँधेरे में ही परिवार घाट पहुँच जाता है।

उगते सूरज को अर्घ्य

व्रती फिर जल में खड़ी होकर सूर्योदय की प्रतीक्षा करती हैं। जैसे ही सूरज की पहली किरण दिखती है, उषा अर्घ्य दिया जाता है। इसी के साथ चार दिन की यह कठिन साधना पूरी होती है।

सूर्य उपासना की याद आए तो कोणार्क का सूर्य मंदिर भी आता है, जिसकी चर्चा हमने जगन्नाथ पुरी मंदिर गाइड में की थी।

पारण और प्रसाद वितरण

अर्घ्य के बाद व्रती घर या घाट पर ही प्रसाद ग्रहण करके पारण करती हैं। आम तौर पर पहले थोड़ा जल या अदरक के साथ कुछ सादा ग्रहण किया जाता है, फिर प्रसाद लिया जाता है। उसके बाद आस-पड़ोस और रिश्तेदारों में प्रसाद बाँटा जाता है।

उस सुबह चेहरे पर थकान भी होती है और अजीब सा सुकून भी। अमित की माँ कहती हैं, "उस पल सारी थकान एक साथ उतर जाती है।"

इस पूरी साधना में जप का भी बड़ा सहारा रहता है। अगर आप सूर्य मंत्र "ॐ सूर्याय नमः" का जप करना चाहें तो Bhakti Vibha का 📿 Digital Mala गिनती रखने में काम आएगा।


छठ पूजा के मुख्य नियम

छठ में नियम बहुत सख्ती से निभाए जाते हैं। ये नियम परंपरा से चले आ रहे हैं।

शुद्धता और सात्विकता

पूरे चार दिन घर में प्याज, लहसुन, माँसाहार और शराब का उपयोग नहीं होता। रसोई और पूजा की चीज़ें अलग रखी जाती हैं। प्रसाद बनाने से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहने जाते हैं।

प्रसाद की मर्यादा

प्रसाद बनाते समय उसे चखा नहीं जाता। जो बर्तन और सामग्री इस्तेमाल हो, वह पूरी तरह साफ होनी चाहिए। कई घरों में इन चार दिनों के लिए अलग बर्तन इस्तेमाल होते हैं।

परिवार का सहयोग

छठ अकेले का व्रत नहीं होता। व्रती के आराम का ख्याल पूरा परिवार रखता है। घर के पुरुष घाट की सफाई, सामान उठाने और व्यवस्था में हाथ बँटाते हैं। बच्चे दउरा सजाने और दीये जलाने में लगे रहते हैं।


छठ से जुड़ी कुछ ज़रूरी सावधानियाँ

यह हिस्सा मैं जानबूझकर अलग से लिख रहा हूँ, क्योंकि श्रद्धा के साथ समझदारी भी ज़रूरी है।

सेहत का ध्यान

36 घंटे का निर्जला व्रत हर किसी के लिए आसान नहीं होता। अगर आपको मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग या कोई और गंभीर बीमारी है, या आप गर्भवती हैं, तो व्रत से पहले डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें। परिवार में बुज़ुर्ग हों तो उनकी उम्र का ध्यान रखें। Bhakti Vibha का Age Calculator परिवार के सदस्यों की सही उम्र जानने में मदद कर सकता है।

घाट पर सुरक्षा

घाट पर भीड़ और फिसलन दोनों होती हैं। बच्चों का हाथ पकड़े रखें और गहरे पानी की तरफ न जाएं। प्रशासन की लगाई हुई बैरिकेडिंग और निर्देशों का पालन करें। रात या भोर के अँधेरे में टॉर्च साथ रखें।

स्वच्छता और पर्यावरण

छठ प्रकृति की उपासना का पर्व है। इसलिए घाट पर प्लास्टिक और कचरा न छोड़ें। प्रसाद की पैकिंग के लिए बाँस, पत्तल और कपड़े का इस्तेमाल करना बेहतर है।


शहर में रहने वाले परिवार क्या करें?

आज बहुत से लोग ऐसी जगह रहते हैं जहाँ नदी या तालाब पास में नहीं है। ऐसे में कुछ बातें काम आती हैं।

कई शहरों और हाउसिंग सोसाइटियों में अब अस्थायी कृत्रिम घाट बनाए जाते हैं। इनकी जानकारी अपने मोहल्ले या सोसाइटी की समिति से ले लें। जहाँ यह भी संभव न हो, वहाँ कई परिवार घर की छत या आँगन में साफ पानी का इंतज़ाम करके पूजा करते हैं।

उदाहरण के तौर पर — मेरे दोस्त सुनील नौकरी के सिलसिले में दिल्ली में रहते हैं। उनके मोहल्ले में हर साल सब मिलकर एक अस्थायी घाट बनाते हैं। सुनील बताते हैं, "भानु भाई, घाट छोटा होता है, लेकिन आस्था वही पुरानी रहती है।"


छठ का सामाजिक संदेश

छठ की एक बहुत सुंदर बात यह है कि इसमें हर किसी की भागीदारी होती है।

सूप और दउरा बाँस के कारीगर बनाते हैं। मिट्टी के दीये और चूल्हे कुम्हार बनाते हैं। गन्ना और फल किसान उगाते हैं। यानी पूरा समाज इस पर्व को मिलकर पूरा करता है।

घाट पर कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। सब एक ही पंक्ति में, एक ही जल में, एक ही सूरज की तरफ मुँह करके खड़े होते हैं। मेरे दादाजी रामस्वरूप सिंह कहते थे, "बेटा, जो पर्व सबको एक घाट पर ले आए, वही सच्चा पर्व है।"

छठ का परिचय और इतिहास संक्षेप में Wikipedia के छठ पर्व वाले पेज पर भी पढ़ा जा सकता है।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

छठ पूजा 2026 कब है?

छठ पूजा 13 नवंबर से 16 नवंबर 2026 तक है। मुख्य दिन, यानी संध्या अर्घ्य, 15 नवंबर 2026, रविवार को है।

छठ पूजा के चार दिन कौन से हैं?

पहला दिन नहाय-खाय, दूसरा खरना, तीसरा संध्या अर्घ्य और चौथा उषा अर्घ्य है। चौथे दिन उगते सूरज को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण होता है।

छठ में किसकी पूजा की जाती है?

इसमें सूर्य देव और छठी मैया की पूजा की जाती है। छठी मैया को षष्ठी देवी भी कहा जाता है।

छठ का मुख्य प्रसाद क्या है?

ठेकुआ छठ का सबसे प्रसिद्ध प्रसाद है। इसके साथ केला, नारियल, गन्ना और मौसमी फल भी सूप में रखे जाते हैं। खरना के दिन गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद बनता है।

छठ का व्रत कितने घंटे का होता है?

खरना का प्रसाद ग्रहण करने के बाद लगभग 36 घंटे का निर्जला उपवास रखा जाता है, जो उषा अर्घ्य के बाद पूरा होता है।

क्या कोई भी छठ का व्रत रख सकता है?

परंपरा में परिवार की महिलाएँ व्रत रखती हैं, पर पुरुष भी व्रत रखते हैं। स्वास्थ्य की स्थिति के हिसाब से डॉक्टर की सलाह लेकर ही निर्जला व्रत रखें।

अगर नदी या तालाब पास में न हो तो क्या करें?

कई शहरों में अस्थायी घाट बनाए जाते हैं। उनकी जानकारी अपने मोहल्ले या सोसाइटी की समिति से लें। अपने परिवार की परंपरा के अनुसार घर पर भी पूजा की जा सकती है।


जाते जाते...

दोस्तों, छठ हमें दो बड़ी बातें सिखाता है। पहली, कृतज्ञता, यानी जिस सूरज की रोशनी से हमारा जीवन चलता है, उसे धन्यवाद कहना। दूसरी, अनुशासन, यानी श्रद्धा के लिए कठिन रास्ता भी पूरे मन से निभाना।

इस छठ पर अगर आपके आस-पास कोई व्रती हों, तो उनकी थोड़ी मदद ज़रूर कीजिए। घाट की सफाई में हाथ बँटाइए या सामान उठाने में साथ दीजिए। यह भी पूजा का ही हिस्सा है।

अमित की माँ की वह बात मुझे आज भी याद है, "यह व्रत हम नहीं रखते, यह हमसे रखवा लिया जाता है।" शायद यही सच्ची श्रद्धा का रूप है।

छठ मैया की जय! सूर्य देव की जय! 🙏

— भानु प्रताप सिंह, Bhakti Vibha

Disclaimer

इस लेख में दी गई तिथियाँ और जानकारी पारंपरिक पंचांग और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। सूर्योदय-सूर्यास्त का समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए अपने क्षेत्र के स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें। निर्जला व्रत या किसी भी स्वास्थ्य संबंधी निर्णय से पहले अपने चिकित्सक से सलाह लें। Bhakti Vibha किसी भी व्यक्तिगत परिणाम के लिए उत्तरदायी नहीं है।


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