मकर संक्रांति 2027: क्यों मनाते हैं यह त्योहार, क्या है इसका महत्व और कैसे करें पूजा — पूरी जानकारी हिंदी में

मकर संक्रांति 2027: क्यों मनाते हैं यह त्योहार, क्या है इसका महत्व और कैसे करें पूजा — पूरी जानकारी हिंदी में

नमस्ते दोस्तों! 🙏

मेरा नाम भानु प्रताप सिंह है और आज बात करेंगे उस त्योहार की जो साल का पहला बड़ा पर्व होता है।

मुझे याद है बचपन में जब मकर संक्रांति आती थी — तो सुबह चार बजे ही घर में हलचल शुरू हो जाती थी। दादी सावित्री देवी सबसे पहले उठती थीं। वो तिल और गुड़ के लड्डू एक रात पहले ही बना लेती थीं। सुबह नहाने के बाद वो हम सब बच्चों को बुलाती थीं और कहती थीं — "पहले तिल खाओ, फिर कुछ और।"

हम बच्चे पूछते थे — "दादी, तिल क्यों खाते हैं?" दादी हँसती थीं और कहती थीं — "बेटा, तिल में सूर्य देव की शक्ति होती है। आज के दिन तिल खाने से पूरे साल सेहत अच्छी रहती है।"

उस वक्त यह बात बस एक दादी की कहानी लगती थी। लेकिन आज जब इस त्योहार के बारे में गहराई से जाना — तो समझ आया कि दादी बिल्कुल सही कहती थीं। मकर संक्रांति सिर्फ एक त्योहार नहीं — यह एक वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक उत्सव है।

आज इस लेख में मैं आपको मकर संक्रांति की हर जरूरी बात बताऊँगा — इतिहास, महत्व, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और वो परंपराएं जो हमारे पूर्वजों ने बड़े सोच-समझकर बनाई थीं।


मकर संक्रांति 2027 — तारीख और शुभ मुहूर्त

सबसे पहले वो जानकारी जो सबसे ज़रूरी है।

2027 में मकर संक्रांति का पावन पर्व 15 जनवरी, शुक्रवार को मनाया जाएगा।

मकर संक्रांति 2027 में 15 जनवरी, शुक्रवार को मनाई जाएगी। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 14 जनवरी 2027 की रात लगभग 9:14 बजे होगा। चूंकि संक्रांति सूर्यास्त के बाद हो रही है, इसलिए स्नान, दान और अन्य धार्मिक कार्यों के लिए पुण्यकाल अगले दिन यानी 15 जनवरी को माना जाएगा।


2027 का पुण्यकाल मुहूर्त


| समय विवरण                    | समय                                        |

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| सूर्य का मकर राशि में प्रवेश | 14 जनवरी, रात 9:14 बजे                     |

| पुण्यकाल                     | 15 जनवरी, सुबह 7:15 बजे से शाम 5:46 बजे तक |

| महापुण्य काल                  | सुबह 7:15  से 9:00 तक               |

| स्नान-दान का विशेष समय       | सुबह 7:15 बजे से 9:00 बजे तक               |


नोट: ये समय नई दिल्ली के अनुसार हैं। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और पुण्यकाल के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है।

मुहूर्त की विस्तृत और सटीक जानकारी के लिए Drik Panchang पर जाएं — यह भारत की सबसे विश्वसनीय पंचांग वेबसाइट है जो हर साल सटीक जानकारी देती है।


मकर संक्रांति क्या है — इसे समझते हैं आसान भाषा में

दोस्तों पहले यह समझते हैं कि संक्रांति का मतलब क्या है।

जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है — उसे संक्रांति कहते हैं। साल में 12 संक्रांतियाँ होती हैं — क्योंकि 12 राशियाँ होती हैं। लेकिन मकर संक्रांति सबसे महत्वपूर्ण है।

मकर संक्रांति का खगोलीय महत्व

14 जनवरी को सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। यही वो दिन है जब सूर्य उत्तरायण होता है — यानी उत्तर दिशा की ओर बढ़ना शुरू करता है।

हमारे शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन कहा गया है। महाभारत में भीष्म पितामह ने बाणों की शय्या पर लेटे हुए उत्तरायण का इंतजार किया था — क्योंकि उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान था और वो उत्तरायण में देह त्यागना चाहते थे।

मेरे दादाजी रामस्वरूप सिंह एक बात हमेशा कहते थे — "बेटा, जब सूरज उत्तर की तरफ मुड़ता है तो समझो कि दिन बड़े होने लगे। यह प्रकाश का बढ़ना है — अंधकार का घटना है। यही मकर संक्रांति का असली संदेश है।"


मकर संक्रांति का इतिहास और पौराणिक कथाएं

इस त्योहार के पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं। आइए उन्हें एक-एक करके जानते हैं।

सूर्य देव और शनि देव का मिलन

पुराणों में एक कथा है कि सूर्य देव और उनके पुत्र शनि देव के बीच मतभेद थे। मकर राशि शनि देव की राशि है। जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं — तो यह पिता का अपने पुत्र के घर आना माना जाता है।

इस दिन पिता-पुत्र का यह मिलन रिश्तों में मिठास का प्रतीक है। इसीलिए इस दिन मीठा खाने और खिलाने की परंपरा है।

मेरे नाना शिवप्रसाद जी इस कथा को बड़े रोचक तरीके से सुनाते थे। वो कहते थे — "बेटा, सूर्य और शनि का झगड़ा भी था — लेकिन उस दिन सूर्य खुद बेटे के घर गए। यह बताता है कि रिश्ते बचाने के लिए बड़ों को भी कदम उठाना पड़ता है।"

गंगा का सागर से मिलन

एक और प्रसिद्ध कथा के अनुसार इसी दिन माँ गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर सागर से मिली थीं और कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए सगर के पुत्रों को मुक्ति मिली थी।

इसीलिए इस दिन गंगासागर में स्नान का विशेष महत्व है। पश्चिम बंगाल में इस दिन गंगासागर मेला लगता है जो देश के सबसे बड़े मेलों में से एक है।

भीष्म पितामह की प्रतीक्षा

महाभारत की कथा के अनुसार कुरुक्षेत्र युद्ध में बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म पितामह ने उत्तरायण का इंतजार किया। उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान था और वो उत्तरायण में प्राण त्यागना चाहते थे — क्योंकि माना जाता है कि उत्तरायण में देह त्यागने वाले को मोक्ष मिलता है।

यह कथा बताती है कि हमारे पूर्वज खगोलीय घटनाओं को कितनी गहराई से समझते थे।

इन पौराणिक कथाओं को विस्तार से पढ़ने के लिए गीता प्रेस गोरखपुर की वेबसाइट पर जाएं जहाँ महाभारत और पुराण हिंदी में उपलब्ध हैं।


मकर संक्रांति और विज्ञान — दादी की बात में था दम

दोस्तों मेरी दादी सावित्री देवी कहती थीं — "तिल खाओ, सेहत अच्छी रहेगी।" क्या यह बात वैज्ञानिक रूप से सही है?

जी हाँ — बिल्कुल सही है।

तिल क्यों खाते हैं मकर संक्रांति पर?

जनवरी में ठंड अपने चरम पर होती है। तिल में तेल, प्रोटीन, कैल्शियम और आयरन भरपूर मात्रा में होता है। तिल खाने से शरीर में गर्मी आती है — जो सर्दियों में बेहद जरूरी है।

गुड़ में आयरन और मिनरल्स होते हैं। तिल और गुड़ का संयोजन — यानी तिल के लड्डू — सर्दियों में शरीर के लिए एक प्राकृतिक ऊर्जा स्रोत है।

हमारे पूर्वज आधुनिक विज्ञान नहीं जानते थे — लेकिन उन्होंने अनुभव से जाना था कि इस मौसम में क्या खाना चाहिए। और उन्होंने इसे एक त्योहार की परंपरा बना दिया — ताकि हर कोई इसे अपनाए।

पतंग क्यों उड़ाते हैं?

मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाना भी एक वैज्ञानिक कारण से शुरू हुआ था।

जनवरी में सुबह की धूप में विटामिन D भरपूर होती है। जब हम पतंग उड़ाते हैं — तो घंटों धूप में रहते हैं। यह धूप हमारी हड्डियों और त्वचा के लिए बहुत फायदेमंद होती है।

मेरे दोस्त राकेश ने एक बार कहा था — "यार, हमारे त्योहारों में इतना विज्ञान छुपा है — बस हम देख नहीं पाते।" सच में — हर परंपरा के पीछे एक गहरी सोच है।


मकर संक्रांति की पूजा विधि — Step by Step

अब सबसे जरूरी हिस्सा — पूजा कैसे करें।

सुबह की तैयारी

इस दिन सूर्योदय से पहले उठें। ब्रह्ममुहूर्त में उठना इस दिन विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

स्नान करें — यदि संभव हो तो तिल मिले पानी से स्नान करें। यह परंपरा बहुत पुरानी है। स्नान के पानी में काले तिल डालकर उससे स्नान करने से पाप क्षय होता है — ऐसी शास्त्रीय मान्यता है।

सूर्य देव की पूजा

स्नान के बाद पूर्व दिशा की ओर मुँह करके खड़े हों। हाथों में जल, तिल और लाल फूल लें।

सूर्य को अर्घ्य देते समय यह मंत्र पढ़ें:

"ॐ सूर्याय नमः। ॐ आदित्याय नमः। ॐ नमो भास्कराय नमः।"

धीरे-धीरे जल अर्पित करें और सूर्य देव का ध्यान करें। यह सोचें कि सूर्य की किरणें आपके शरीर और मन में ऊर्जा भर रही हैं।

सूर्य देव की पूजा विधि और मंत्रों की विस्तृत जानकारी के लिए Astro Upaay पर जाएं जहाँ हिंदी में विस्तृत पूजा विधियाँ उपलब्ध हैं।

दान का महत्व

मकर संक्रांति पर दान का बहुत बड़ा महत्व है। इस दिन दान करने से उसका फल कई गुना अधिक मिलता है — ऐसी शास्त्रीय मान्यता है।

क्या दान करें:

  • तिल और गुड़
  • कंबल और गर्म कपड़े — जो सर्दियों में ज़रूरतमंदों के काम आएं
  • खिचड़ी — इसीलिए इस त्योहार को कई जगह खिचड़ी भी कहते हैं
  • आटा, चावल और दाल

मेरे नाना शिवप्रसाद जी हर साल मकर संक्रांति पर गाँव के गरीब परिवारों को कंबल बाँटते थे। वो कहते थे — "बेटा, जब सर्दी में किसी के काँपते हाथों को कंबल देते हो — तो उस पल जो सुकून मिलता है वो किसी मंदिर में नहीं मिलता।"


भारत के अलग-अलग राज्यों में मकर संक्रांति कैसे मनाते हैं

यह बात बड़ी रोचक है — एक ही त्योहार पूरे भारत में अलग-अलग नामों और तरीकों से मनाया जाता है।

उत्तर प्रदेश और बिहार — खिचड़ी

उत्तर प्रदेश और बिहार में इस त्योहार को खिचड़ी कहते हैं। यहाँ इस दिन उड़द दाल और चावल की खिचड़ी बनाई और दान की जाती है। प्रयागराज में इस दिन संगम स्नान का विशेष महत्व है।

पंजाब और हरियाणा — लोहड़ी

पंजाब और हरियाणा में मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी मनाई जाती है। इस दिन अलाव जलाकर उसके चारों ओर नाचते-गाते हैं। तिल, मूँगफली और गज्जक अलाव में डाली जाती है।

गुजरात — उत्तरायण

गुजरात में इस त्योहार को उत्तरायण कहते हैं। यहाँ पतंगबाजी की धूम रहती है। अहमदाबाद का पतंग महोत्सव विश्व प्रसिद्ध है — जहाँ देश-विदेश से लोग आते हैं।

तमिलनाडु — पोंगल

तमिलनाडु में यह त्योहार पोंगल के नाम से मनाया जाता है — और यह चार दिन तक चलता है। इसमें नए चावल से खीर बनाकर सूर्य देव को अर्पित की जाती है।

असम — माघ बिहू

असम में इसे माघ बिहू कहते हैं। यहाँ इस दिन भेलाघर — यानी घास-फूस से बने घर — बनाए जाते हैं और अगले दिन उन्हें जलाया जाता है।

यह विविधता बताती है कि हमारा भारत कितना समृद्ध है — एक ही भावना को अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है।

भारत के विभिन्न त्योहारों और परंपराओं की जानकारी के लिए भारत सरकार का India.gov.in पोर्टल देखें — जहाँ सभी राज्यों के त्योहारों की विस्तृत जानकारी उपलब्ध है।


मकर संक्रांति और गंगासागर — जहाँ लाखों लोग डुबकी लगाते हैं

गंगासागर — यानी जहाँ गंगा नदी बंगाल की खाड़ी में मिलती है। यह पश्चिम बंगाल के सागर द्वीप पर स्थित है।

मकर संक्रांति पर यहाँ लाखों श्रद्धालु स्नान के लिए आते हैं। कहते हैं — "सब तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार।" यानी दूसरे तीर्थों पर बार-बार जाना वही फल देता है जो एक बार गंगासागर में स्नान देता है।

मेरे नाना शिवप्रसाद जी एक बार गंगासागर गए थे। वो लौटकर बताते थे — "बेटा, वहाँ की भीड़ देखकर पहले डर लगा। लेकिन जब सुबह के अंधेरे में हज़ारों लोगों के साथ उस ठंडे पानी में उतरा — तो एक अजीब सी शांति मिली। उस पल ऐसा लगा जैसे सालों का बोझ उतर गया।"


मकर संक्रांति पर क्या करें और क्या न करें

इस दिन जरूर करें

इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें — चाहे ठंड कितनी भी हो। तिल और गुड़ का सेवन जरूर करें। किसी जरूरतमंद को कुछ न कुछ दान करें — चाहे छोटा ही सही। परिवार के साथ मिलकर पूजा करें। पतंग उड़ाएं — सुबह की धूप में।

इस दिन न करें

इस दिन माँसाहार और शराब से दूर रहें। किसी से झगड़ा न करें — यह दिन मिठास का है। किसी को दुख न दें — न शब्दों से, न कर्म से। बड़ों का अपमान न करें।


मकर संक्रांति पर बनने वाले पारंपरिक पकवान

हर त्योहार के साथ खाने का भी अपना मज़ा होता है। मकर संक्रांति पर कुछ खास पकवान बनते हैं जो इस दिन को और यादगार बनाते हैं।

तिल के लड्डू: तिल और गुड़ से बने लड्डू इस त्योहार की पहचान हैं। मेरी दादी सावित्री देवी के हाथ के तिल के लड्डू आज भी याद आते हैं — उनकी बात ही अलग थी।

खिचड़ी: उड़द दाल और चावल की खिचड़ी — घी के साथ। सर्दियों में यह एक पौष्टिक और गर्म भोजन है।

गज्जक: तिल और गुड़ से बनी कड़क मिठाई — पंजाब और उत्तर भारत में बहुत लोकप्रिय।

पोंगल: तमिलनाडु में नए चावल और गुड़ से बनी खीर — जो सूर्य देव को अर्पित की जाती है।

मूँगफली की चिक्की: सर्दियों में मूँगफली और गुड़ की चिक्की एक पारंपरिक मिठाई है।


इस त्योहार का असली संदेश — जो हमें हर साल याद दिलाता है

दोस्तों मकर संक्रांति केवल एक दिन का उत्सव नहीं है। यह एक संदेश है।

सूर्य का उत्तरायण होना — यह प्रकृति का संकेत है कि अंधकार घट रहा है, प्रकाश बढ़ रहा है। दिन बड़े होंगे, रातें छोटी होंगी। ठंड जाएगी, बसंत आएगा।

और यही जीवन का भी सत्य है — हर बुरा दौर खत्म होता है। हर अंधेरी रात के बाद सवेरा आता है।

मेरे नाना शिवप्रसाद जी की एक बात हमेशा याद रहती है। वो कहते थे — "बेटा, जब ज़िंदगी में अंधेरा आए — तो मकर संक्रांति याद कर लेना। सूरज को देख — वो हर रात के बाद उगता है। तुम भी उठोगे।"


जाते जाते...

दोस्तों इस मकर संक्रांति पर एक काम जरूर करें।

किसी एक जरूरतमंद को — चाहे एक कंबल हो, या एक किलो तिल के लड्डू — कुछ दें। उस इंसान के चेहरे पर जो मुस्कान आएगी — वो इस त्योहार की सबसे बड़ी पूजा होगी।

और जब सुबह सूरज उगे — तो एक पल के लिए रुकिए। उस रोशनी को महसूस करिए। वो रोशनी सिर्फ धूप नहीं है — वो उम्मीद है, वो जीवन है, वो ऊर्जा है।

मकर संक्रांति की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं! 🪁🌞

— भानु प्रताप सिंह, Bhakti Vibha

Disclaimer 

इस लेख में दी गई मुहूर्त और तिथि की जानकारी पारंपरिक पंचांग पर आधारित है। अपने क्षेत्र के स्थानीय पंचांग से पुष्टि अवश्य करें। Bhakti Vibha किसी भी व्यक्तिगत परिणाम के लिए उत्तरदायी नहीं है।

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