उद्धव प्रसंग: जब कृष्ण के 'ज्ञानी' मित्र गोपियों के 'प्रेम' के आगे हार गए | Bhakti Vibha
यह केवल एक पौराणिक कथा नहीं है, यह हृदय और मस्तिष्क के बीच के उस संघर्ष की कहानी है, जिसमें अंततः जीत 'अथाह प्रेम' की ही होती है।
उद्धव और गोपियों के इस संवाद का विस्तृत वर्णन
भगवान श्रीकृष्ण के गोकुल छोड़ने के बाद उनके विरह के भावों को समझने के लिए इसे भी
ज्ञान का अहंकार और मथुरा का सूनापन
कंस के वध के बाद श्रीकृष्ण मथुरा के राजा तो बन गए थे, लेकिन उनका मन आज भी वृंदावन की कुंज-गलियों में भटकता था। महलों के रेशमी बिस्तरों पर उन्हें नींद नहीं आती थी, क्योंकि कानों में आज भी गोपियों की पुकार और राधा के मौन सिसकियों की गूँज सुनाई देती थी।
श्रीकृष्ण के एक परम मित्र थे— उद्धव। उद्धव साक्षात बृहस्पति के शिष्य थे, परम ज्ञानी थे और उनका मानना था कि ईश्वर को केवल 'योग' और 'निर्गुण निराकार ब्रह्म' के ध्यान से ही पाया जा सकता है। उन्हें लगता था कि प्रेम, विरह और आंसू ये सब सांसारिक मोह हैं।
एक दिन कृष्ण ने उद्धव की आंखों में छिपे इसी 'ज्ञान के अहंकार' को देखा और मुस्कुराकर बोले, "सखा उद्धव, मुझे ब्रज की बहुत याद आती है। वहाँ की गोपियां मेरे वियोग में व्याकुल हैं। तुम परम ज्ञानी हो, क्यों न तुम वहाँ जाकर उन्हें योग और ज्ञान का संदेश दो, ताकि उनका कष्ट कुछ कम हो सके?"
उद्धव सहर्ष तैयार हो गए। उन्हें लगा कि वे अपनी तर्कशक्ति से भोली-भाली गोपियों को समझा देंगे कि कृष्ण शरीर नहीं, आत्मा हैं।
जब ज्ञान पहुँचा प्रेम की चौखट पर
उद्धव जब स्वर्ण रथ पर सवार होकर ब्रज की सीमा में घुसे, तो उन्हें लगा कि यहाँ के लोग दुखी होंगे। पर उन्होंने जो देखा, उसने उनके ज्ञान की पहली ईंट हिला दी। ब्रज का कण-कण 'कृष्ण' पुकार रहा था। जमुना के किनारे सूखे पड़े थे, गायों ने घास खाना छोड़ दिया था और गोपियों की आँखों के काजल आंसुओं के साथ बहकर सूख चुके थे।
जैसे ही गोपियों को पता चला कि मथुरा से कृष्ण का संदेश लेकर कोई आया है, वे पागलों की तरह उद्धव के रथ की ओर दौड़ीं। ब्रज की हर आँख में बस एक ही प्यास थिरक रही थी— क्या मोहन ने अपनी कोई निशानी भेजी है? क्या वो सांवली सूरत एक बार फिर इन गलियों में कदम रखने वाली है?
निराकार ब्रह्म बनाम साकार प्रेम
उद्धव के चेहरे पर ज्ञान की कठोरता थी। उन्होंने अपनी आँखें मूँद लीं और एक ऊँचे स्वर में कहना शुरू किया— गोपियों! तुम क्यों उस ग्वाले के लिए रोती हो? वह तो ईश्वर है, वह सर्वत्र है। अपनी आँखें बंद करो और उस निराकार ब्रह्म का ध्यान करो जो तुम्हारे भीतर है। योग साधना करो, यह विरह खत्म हो जाएगा।"
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उद्धव की बातें सुनकर गोपियाँ पहले तो चुप रहीं, फिर एक गोपी (मथुरा की कुब्जा का उदाहरण देते हुए या कटाक्ष करते हुए) बोली:
"हे उद्धव! हमारे पास दस-बीस मन नहीं हैं। हमारे पास तो एक ही हृदय था, जो मोहन के साथ मथुरा चला गया। अब तुम ही बताओ, हम तुम्हारे इस निराकार 'ईश' की आराधना किस मन से करें?"
यह तर्क नहीं था, यह वह सत्य था जिसे सुनकर उद्धव सन्न रह गए। गोपियों ने आगे कहा, "उद्धव, योग की बातें उनके लिए होती हैं जिनका मन भटकता है। हमारा मन तो कृष्ण में स्थिर है। तुम हमें वह दवा दे रहे हो जिसकी हमें बीमारी ही नहीं है।"
वो 'भ्रमर' और विरह की पराकाष्ठा
उसी समय वहाँ एक काला भौंरा (भ्रमर) उड़ता हुआ आया। गोपियों ने उस भौंरे को माध्यम बनाकर उद्धव को जो खरी-खोटी सुनाई, उसे ही साहित्य में 'भ्रमर गीत' कहा जाता है। उन्होंने कहा कि उद्धव तुम उस काले भौंरे की तरह हो जो बस रस लेना जानता है, प्रेम का दर्द नहीं समझता।
एक गोपी ने सिसकते हुए कहा, "उद्धव, कृष्ण से कहना कि यहाँ की कुंज-गलियाँ अब हमें काटने को दौड़ती हैं। जो चंद्रमा पहले शीतलता देता था, अब वह आग बरसाता है। हमारी आँखों ने अब देखना छोड़ दिया है, क्योंकि वे सिर्फ उन्हें देखना चाहती हैं।"
जब 'ज्ञानी' बन गया 'भक्त'
गोपियों का निस्वार्थ प्रेम देखकर उद्धव का कलेजा फटने लगा। उन्होंने देखा कि ये अनपढ़ गोपियाँ उस परमात्मा को उस ऊँचाई पर जानती हैं जहाँ बड़े-बड़े योगी हज़ारों वर्षों की तपस्या के बाद भी नहीं पहुँच पाते।
उद्धव के ज्ञान का सूरज अस्त हो चुका था और प्रेम का चंद्रमा उदय हो रहा था। उनकी आँखों से अविरल आंसू बहने लगे। जो उद्धव गोपियों को सिखाने आए थे, वे स्वयं उनके चरणों की धूल सिर पर लगाने लगे।
उद्धव ने हाथ जोड़कर कहा, "हे गोपियों! धन्य है तुम्हारा प्रेम। मैं तो व्यर्थ ही शास्त्र पढ़ता रहा। ईश्वर को पाना है तो बस ऐसा ही रोना चाहिए जैसा तुम रो रही हो।"
मथुरा वापसी: एक नया उद्धव
जब उद्धव वापस मथुरा पहुँचे, तो वे वह पुराने वाले उद्धव नहीं थे। उनके हाथ खाली थे, पर हृदय प्रेम से भरा था। कृष्ण ने उन्हें देखते ही पूछा, "कहो सखा! कैसा रहा संदेशा? क्या गोपियाँ योग करने को राजी हुईं?"
Gemini said
उद्धव का अहंकार आंसुओं में पिघल चुका था। उन्होंने कांपते स्वर में कहा:"प्रभु! मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं उन्हें क्या सिखाता, मैं तो खुद उनसे प्रेम का पाठ सीखकर आया हूँ। ब्रज की उन गोपियों के चरणों की धूल मिल जाए, तो मेरा जीवन सफल हो जाए।"
कृष्ण मंद-मंद मुस्कुराए। वे यही तो चाहते थे कि उनके सखा का ज्ञान, भक्ति के बिना अधूरा न रहे।
निष्कर्ष: हमारे जीवन के लिए संदेश
उद्धव प्रसंग हमें सिखाता है कि हम चाहे कितने भी पढ़े-लिखे क्यों न हो जाएं, कितनी भी डिग्रियां क्यों न ले लें, लेकिन यदि हमारे भीतर करुणा, प्रेम और भक्ति नहीं है, तो सब व्यर्थ है। तर्क से हम बहस जीत सकते हैं, पर प्रेम से हम 'परमात्मा' को जीत सकते हैं।
दोस्तों, यह 'उद्धव प्रसंग' हमें सिखाता है कि ईश्वर केवल मंदिर की मूर्तियों में नहीं, बल्कि प्रेमी हृदय के आंसुओं में बसता है। आपको यह लेख कैसा लगा? कमेंट में 'जय श्री कृष्ण' लिखकर हमें जरूर बताएं और इसे अपने परिवार के साथ शेयर करें।

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