नमस्कार दोस्तों 🙏

क्या आपने कभी सोचा है कि जब हम मर्यादित होते हैं, तो राम याद आते हैं। लेकिन जब जीवन उलझ जाता है, जब सही और गलत का भेद मिट जाता है, जब अपने ही दुश्मन बन जाते हैं, तब मन अचानक पुकारता है — “हे गोविंद…”

यह अनायास नहीं है। श्रीकृष्ण केवल एक देवता नहीं हैं। वे जीवन जीने की सबसे व्यावहारिक कला (Practical Art of Living) हैं।

राम ने सिखाया कि मर्यादा में कैसे रहें। कृष्ण ने सिखाया कि जब मर्यादा के नाम पर अधर्म हो रहा हो, तो धर्म की रक्षा कैसे करें।

आज के इस दौर में, जहाँ हर दूसरा व्यक्ति तनाव (Stress) में है, श्रीकृष्ण का चरित्र किसी मनोवैज्ञानिक (Psychologist) से कम नहीं है। आइये, आज हम 'कान्हा' को एक अलग नज़रिए से देखते हैं।

कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को गीता का ज्ञान देते हुए भगवान श्रीकृष्ण
कर्म का सिद्धांत समझाते हुए माधव।

श्रीकृष्ण: जो युद्ध में भी मुस्कुराना जानते हैं

अक्सर लोग सोचते हैं कि भगवान होने का मतलब है — सब कुछ ठीक कर देना। लेकिन कृष्ण का जीवन देखिए:

जेल (कारागार) में जन्म हुआ जन्म लेते ही माता-पिता से बिछड़ गए बचपन में राक्षसों के हमले झेले गोकुल छोड़ा, मथुरा छोड़ा, फिर द्वारका जाना पड़ा अपने ही मामा (कंस) का वध करना पड़ा गांधारी का श्राप सहा और अंत में, अपने ही कुल का विनाश देखा।

इतना सब कुछ सहने के बाद भी, क्या आपने कभी रोते हुए कृष्ण की मूर्ति देखी है? नहीं। उनके चेहरे पर हमेशा एक मंद मुस्कान होती है।

आज हम छोटी-सी ऑफिस की राजनीति से परेशान हो जाते हैं। कृष्ण हमें सिखाते हैं: “परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विकट हों, अपनी मुस्कान और आंतरिक शांति को मत खोना।” यही असली योग है।

अर्जुन का विषाद: आज का Depression

महाभारत के युद्ध से पहले अर्जुन की हालत याद है? हाथ कांप रहे थे, गांडीव छूट रहा था, दिमाग सुन्न था। अर्जुन ने कहा: “मैं नहीं लड़ सकता, मैं हार मानता हूँ।”

यह आज के युवा की कहानी है। इसे आज हम Anxiety और Depression कहते हैं। जब जीवन के कुरुक्षेत्र (Career, Exams, Relations) में हम घबरा जाते हैं।

कृष्ण ने अर्जुन को डांटा नहीं। न ही यह कहा कि “मर्द बनो।” कृष्ण ने सबसे पहले उसे सुना। उन्होंने सिखाया:

भागना समाधान नहीं है। संघर्ष ही जीवन का सत्य है। अर्जुन, तुम केवल अपना कर्म करो।

कृष्ण दुनिया के पहले काउंसलर (Counselor) थे, जिन्होंने अर्जुन को डिप्रेशन से बाहर निकालकर वापस कर्म के रास्ते पर खड़ा किया।

प्रकृति के बीच बांसुरी बजाते हुए मुरली मनोहर श्रीकृष्ण और गायें
मानसिक शांति का प्रतीक: कान्हा की बांसुरी।

कर्म योग: उम्मीद का बोझ उतार फेंको

आज हम सबसे ज्यादा दुखी क्यों हैं? क्योंकि हम काम शुरू करने से पहले ही परिणाम (Result) के बारे में सोचने लगते हैं।

“अगर सिलेक्शन नहीं हुआ तो?” “अगर उसने मना कर दिया तो?” “अगर बिज़नेस डूब गया तो?”

यही ‘अगर’ हमारे दुख का कारण है। कृष्ण का सबसे बड़ा सूत्र है: “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

इसका अर्थ यह नहीं कि फल मिलेगा नहीं। इसका अर्थ है: फल की चिंता में, आज का कर्म मत बिगाड़ो।

जब आप रिजल्ट का बोझ दिमाग से उतार देते हैं, तो आप 100% क्षमता के साथ काम करते हैं। यही सफलता का राज़ है। कृष्ण कहते हैं: “भविष्य मेरे हाथ में है, वर्तमान तुम्हारे हाथ में।”

प्रेम: राधा और रुक्मिणी का अंतर

आज की दुनिया में प्रेम का मतलब है: “पा लेना”, “शादी करना”, “हक जताना”।

लेकिन कृष्ण का प्रेम देखिए। उन्होंने राधा से विवाह नहीं किया। फिर भी, हम ‘रुक्मिणी-कृष्ण’ नहीं, ‘राधा-कृष्ण’ कहते हैं।

क्यों? क्योंकि कृष्ण ने सिखाया: प्रेम का अंत विवाह नहीं है। प्रेम का अर्थ है — आत्मा का जुड़ाव।

राधा ने कभी शिकायत नहीं की कि कृष्ण चले गए। कृष्ण ने कभी राधा को भूलने का नाटक नहीं किया। शारीरिक दूरी, प्रेम को खत्म नहीं कर सकती।

आज के रिश्ते इसलिए टूटते हैं क्योंकि हम दूसरे को अपनी जागीर (Possession) समझ लेते हैं। कृष्ण सिखाते हैं: “प्रेम मुक्ति देता है, बांधता नहीं।”

सुदामा: दोस्ती में स्टेटस नहीं होता

आजकल दोस्ती भी ‘स्टेटस’ देखकर की जाती है। “यह मेरे लेवल का नहीं है।”

लेकिन द्वारकाधीश (राजा) होते हुए भी, कृष्ण ने फटेहाल सुदामा को अपने सिंहासन पर बैठाया। उनके पैर अपने आंसुओं से धोए।

कृष्ण ने यह नहीं देखा कि सुदामा क्या लाया है। कृष्ण ने यह देखा कि सुदामा किस भाव से लाया है।

आज की कॉर्पोरेट दुनिया और सोशल मीडिया के दौर में, जहाँ हर रिश्ता एक सौदे जैसा लगता है, कृष्ण और सुदामा की मैत्री याद दिलाती है: “रिश्ते दिमाग से नहीं, दिल से निभाए जाते हैं।”

ब्रह्मांड के स्वामी, सुदर्शन चक्रधारी भगवान श्रीकृष्ण का विराट स्वरूप
धर्म की रक्षा के लिए तत्पर सुदर्शन चक्रधारी।


बांसुरी और चक्र: संतुलन (Balance) ही जीवन है

कृष्ण के एक हाथ में बांसुरी है, दूसरे हाथ में सुदर्शन चक्र

यह विरोधाभास (Contradiction) नहीं है। यह जीवन का संतुलन है।

बांसुरी प्रतीक है — प्रेम, कला, संगीत और कोमलता का। सुदर्शन चक्र प्रतीक है — कर्तव्य, कठोरता, नियम और धर्म का।

कृष्ण हमें सिखाते हैं: जीवन में कोमल बनो, प्रेम करो, बांसुरी बजाओ। लेकिन जब अन्याय हो, जब धर्म पर आंच आए, तो चक्र उठाने (कठोर बनने) से मत हिचकिचाओ।

आज हम या तो बहुत भावुक हो जाते हैं, या बहुत पत्थर दिल। कृष्ण जैसा संतुलन ही जीवन को सफल बनाता है। ज़रूरत पड़ने पर फूल, और ज़रूरत पड़ने पर वज्र।

जब निर्णय कठिन हो जाए (The Grey Areas)

राम का युग ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ था (स्पष्ट सही और गलत)। कृष्ण का युग ‘ग्रे’ (Grey) था।

कभी-कभी सच बोलने से बड़ा धर्म, झूठ बोलने में होता है (जैसे अश्वत्थामा का वध)। कभी-कभी हथियार न उठाना ही सबसे बड़ा हथियार होता है।

जब आप धर्मसंकट में फंस जाएं, कि क्या सही है और क्या गलत, तो कृष्ण का यह मंत्र याद रखें:

“जो निर्णय समाज और मानवता के हित में है, वही धर्म है, चाहे वह नियमों के विरुद्ध क्यों न दिखे।”


निष्कर्ष: कृष्ण बाहर नहीं, आपके विवेक में हैं

दोस्तों, श्रीकृष्ण को किसी मंदिर में मत खोजिए। कृष्ण तो एक चेतना (Consciousness) हैं।

जब भी आप हारने लगें, जब भी अकेलापन घेरे, तो अपनी आंखें बंद करें और सोचें: “अगर मेरी जगह कृष्ण होते, तो क्या करते?”

जवाब आपको अपने भीतर से मिलेगा। कृष्ण: आपके आत्मविश्वास में हैं। आपकी मुस्कान में हैं। आपके संघर्ष में हैं।

वे कहते हैं: “मैं हर जगह हूँ। बस तुम मुझे अहंकार छोड़कर पुकारो।” द्रौपदी ने जब तक खुद को बचाने की कोशिश की, कृष्ण नहीं आए। जैसे ही उसने दोनों हाथ उठाकर समर्पण किया, कृष्ण वस्त्र बनकर आ गए।

जीवन भी ऐसा ही है। चिंता छोड़ो, चिंतन करो। बाकी सब उस ‘मुरली वाले’ पर छोड़ दो।


❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. आज के कलयुग में श्रीकृष्ण की शिक्षाएँ कैसे प्रासंगिक हैं? आज तनाव और डिप्रेशन सबसे बड़ी समस्याएं हैं। गीता का निष्काम कर्म योग (फल की चिंता किए बिना काम करना) ही मानसिक शांति का एकमात्र उपाय है।

2. श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध क्यों नहीं रोका? वे रोक सकते थे, लेकिन वे चाहते थे कि मनुष्य अपने कर्मों का फल खुद भोगे और अधर्म का नाश जड़ से हो। शांति का मतलब अन्याय सहना नहीं है।

3. हम अपने दैनिक जीवन में कृष्ण को कैसे महसूस करें? हर काम को पूरी ईमानदारी और खुशी से करना ही कृष्ण की पूजा है। जब आप किसी की निस्वार्थ मदद करते हैं, तो आपमें कृष्ण झलकते हैं।

4. कृष्ण का सबसे बड़ा पाठ (Lesson) क्या है? परिवर्तन (Change) को स्वीकार करो। जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था, परसों किसी और का होगा। परिवर्तन ही संसार का नियम है।

5. जब मन बहुत अशांत हो तो क्या करें? बस "हरे कृष्ण" महामंत्र का जाप करें या गीता के कुछ श्लोक पढ़ें। यह मन को तुरंत 'रीसेट' (Reset) करने का काम करता है।


🙏 जय श्री कृष्णा

अगर इस लेख ने आपकी चिंताओं को थोड़ा भी कम किया हो, या आपको एक नई दिशा दी हो, तो इसे अपने उन दोस्तों के साथ साझा (Share) करें, जो जीवन की उलझनों से जूझ रहे हैं। शायद कान्हा का यह संदेश उनके चेहरे पर भी मुस्कान ले आए।

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