भीष्म पितामह का चित्र – महाभारत के महान योद्धा

भूमिका: भारतीय संस्कृति में भीष्म पितामह का स्थान

भारतीय महाकाव्य महाभारत में अनेक महान पात्र हैं, परंतु उनमें भीष्म पितामह का स्थान अद्वितीय है। वे केवल एक अपराजेय योद्धा ही नहीं थे, बल्कि त्याग, वचनबद्धता, कर्तव्यनिष्ठा और धर्म के जीवंत प्रतीक भी थे। उनका संपूर्ण जीवन एक ऐसी अमर गाथा है, जिसमें शक्ति से अधिक संयम, सत्ता से अधिक सेवा और विजय से अधिक धर्म का महत्व दिखाई देता है। भीष्म का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची महानता अपने स्वार्थ का त्याग कर दूसरों के हित के लिए समर्पित होने में है।


भीष्म का जन्म और दैवीय पृष्ठभूमि

राजा शांतनु और गंगा का विवाह

हस्तिनापुर के प्रतापी राजा शांतनु एक दिन गंगा तट पर पहुँचे, जहाँ उनकी भेंट देवी स्वरूपा गंगा से हुई। दोनों के बीच प्रेम हुआ और विवाह भी, परंतु गंगा ने एक कठोर शर्त रखी कि राजा कभी उनके किसी भी कार्य पर प्रश्न नहीं करेंगे। राजा ने यह शर्त स्वीकार कर ली।

गंगा ने अपने आठ नवजात शिशुओं को नदी में प्रवाहित कर दिया। राजा शांतनु मौन रहे, परंतु जब आठवें पुत्र को भी गंगा नदी में ले जाने लगीं, तब राजा से रहा नहीं गया। प्रश्न करते ही गंगा अंतर्धान हो गईं और शिशु को राजा को सौंप दिया। यही बालक आगे चलकर देवव्रत कहलाया।

अष्ट वसु और देवव्रत का अवतार

देवव्रत वास्तव में अष्ट वसुओं में से एक का अवतार थे। ऋषि वशिष्ठ के श्राप के कारण उन्हें पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा था। गंगा ने उनका पालन-पोषण किया और उन्हें दिव्य शिक्षा प्रदान की। देवव्रत बचपन से ही असाधारण प्रतिभा, अनुशासन और वीरता से युक्त थे।

 महाभारत: भारतीय संस्कृति का अनमोल धरोहर


देवव्रत से भीष्म बनने की कथा
भीष्म प्रतिज्ञा लेते हुए देवव्रत

सत्यवती और राजगद्दी का प्रश्न

समय बीतने पर राजा शांतनु की भेंट सत्यवती से हुई। वे उनसे विवाह करना चाहते थे, परंतु सत्यवती के पिता ने शर्त रखी कि उनके पुत्र को ही हस्तिनापुर का राजा बनाया जाएगा। यह शर्त देवव्रत के उत्तराधिकार के विरुद्ध थी। राजा शांतनु इस दुविधा में अत्यंत दुखी रहने लगे।

भीष्म प्रतिज्ञा: त्याग की पराकाष्ठा

पिता के दुख को देखकर देवव्रत स्वयं सत्यवती के पिता के पास गए और ऐसी प्रतिज्ञा ली जिसने इतिहास बदल दिया। उन्होंने न केवल राजसिंहासन का त्याग किया, बल्कि आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत भी ले लिया। उनकी इस भयानक प्रतिज्ञा से देवता भी कांप उठे और तभी से वे भीष्म कहलाए।

यह प्रतिज्ञा केवल व्यक्तिगत त्याग नहीं थी, बल्कि कुरु वंश की स्थिरता और पिता की प्रसन्नता के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान थी।


कुरु वंश के संरक्षक के रूप में भीष्म

भीष्म ने कभी स्वयं राजा बनने की इच्छा नहीं की, परंतु वे हस्तिनापुर की राजनीति और प्रशासन की रीढ़ बने रहे। राजा विचित्रवीर्य के निधन के बाद भी उन्होंने कुरु वंश को संभाला। वे हर पीढ़ी के लिए पितामह समान थे—राजाओं के मार्गदर्शक, योद्धाओं के प्रेरक और प्रजा के संरक्षक।


गुरु, योद्धा और आदर्श सेनानायक

अस्त्र-शस्त्र में अद्वितीय निपुणता

भीष्म ने महान योद्धा परशुराम से शिक्षा प्राप्त की। धनुर्विद्या में वे अद्वितीय थे। कहा जाता है कि युद्धभूमि में उनका सामना करना मृत्यु को आमंत्रण देना था।

शिक्षक के रूप में भीष्म

यद्यपि औपचारिक गुरु द्रोणाचार्य थे, फिर भी भीष्म का प्रभाव अर्जुन, कर्ण और अन्य महारथियों पर स्पष्ट दिखाई देता है। उनका जीवन स्वयं एक चलता-फिरता शास्त्र था।


अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका की कथा

काशी नरेश की तीन पुत्रियाँ—अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका—का स्वयंवर जीतकर भीष्म उन्हें हस्तिनापुर लाए। बाद में अम्बा ने अपने प्रेम का हवाला दिया, किंतु अपमान और पीड़ा से आहत होकर उसने प्रतिशोध की प्रतिज्ञा ली। यही अम्बा आगे चलकर भीष्म के पतन का कारण बनी।


महाभारत युद्ध में भीष्म की भूमिका
महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह

कौरवों की ओर से युद्ध का निर्णय

महाभारत युद्ध के समय भीष्म भली-भाँति जानते थे कि पांडव धर्म के पक्ष में हैं। फिर भी उन्होंने कौरवों की सेना का नेतृत्व स्वीकार किया, क्योंकि वे हस्तिनापुर के सिंहासन के प्रति निष्ठावान थे।

धर्म और प्रतिज्ञा का आंतरिक संघर्ष

भीष्म का जीवन इस बात का उदाहरण है कि कभी-कभी कर्तव्य और धर्म के बीच गहरा संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। वे पांडवों को आशीर्वाद भी देते थे और युद्ध में उनका सामना भी करते थे।


शिखंडी और भीष्म का पतन
शरशय्या पर गिरे भीष्म पितामह

अम्बा ने पुनर्जन्म लेकर शिखंडी का रूप धारण किया। शिखंडी के सामने भीष्म ने शस्त्र उठाने से इंकार कर दिया, क्योंकि वे उसे स्त्री-जन्म से जुड़ा मानते थे। इस अवसर का लाभ उठाकर अर्जुन ने उन पर बाणों की वर्षा कर दी और भीष्म शरशय्या पर गिर पड़े।


शरशय्या पर भीष्म: ज्ञान का महासागर
युधिष्ठिर को धर्म का उपदेश देते भीष्म

युधिष्ठिर को धर्मोपदेश

शरशय्या पर लेटे हुए भी भीष्म केवल योद्धा नहीं, बल्कि महान ऋषि समान दिखाई देते हैं। उन्होंने युधिष्ठिर को राजधर्म, आपद्धर्म, दान, नीति और मोक्ष का गहन उपदेश दिया। यही उपदेश आगे चलकर भारतीय राजनीति और नैतिक दर्शन की आधारशिला बने।


भीष्म की मृत्यु और मोक्ष

इच्छामृत्यु के वरदान के कारण भीष्म उत्तरायण के शुभ समय की प्रतीक्षा करते रहे। जैसे ही सूर्य उत्तर दिशा में बढ़ा, उन्होंने योगबल से शरीर त्याग दिया और मोक्ष को प्राप्त हुए। उनकी मृत्यु शोक नहीं, बल्कि उत्सव के समान थी—एक महान आत्मा का परमगति की ओर प्रस्थान।


भीष्म पितामह से मिलने वाली जीवन शिक्षाएँ

  • वचन का पालन जीवन से भी अधिक मूल्यवान है

  • त्याग सबसे बड़ा बल है

  • धर्म का मार्ग कठिन है, पर अनिवार्य है

  • शक्ति के साथ विवेक आवश्यक है

  • कर्तव्य और करुणा का संतुलन ही सच्चा आदर्श है


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: भीष्म पितामह को इच्छामृत्यु का वरदान किसने दिया?
उत्तर: उनके पिता राजा शांतनु ने।

प्रश्न 2: भीष्म ने आजीवन विवाह क्यों नहीं किया?
उत्तर: उन्होंने ब्रह्मचर्य की कठोर प्रतिज्ञा ली थी।

प्रश्न 3: भीष्म पांडवों के विरुद्ध क्यों लड़े?
उत्तर: हस्तिनापुर के सिंहासन के प्रति निष्ठा के कारण।

प्रश्न 4: भीष्म को कौन पराजित कर सका?
उत्तर: शिखंडी की आड़ में अर्जुन ने।

प्रश्न 5: भीष्म का सबसे बड़ा गुण क्या था?
उत्तर: त्याग और वचनबद्धता।

प्रश्न 6: भीष्म का जीवन आज के समय में क्या सिखाता है?
उत्तर: नैतिकता, कर्तव्य और आत्मसंयम का महत्व।


निष्कर्ष

भीष्म पितामह केवल महाभारत के एक पात्र नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की आत्मा हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची महानता सत्ता, भोग या विजय में नहीं, बल्कि त्याग, धैर्य और धर्म में है। उनकी अमर गाथा युगों-युगों तक मानवता को प्रेरणा देती रहेगी और देती रहेगी।

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